कवि-सम्मेलन में बाहुबली

कवि-सम्मेलन में बाहुबली

एक बार एक बाहुबली को कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करने का मौका मिला और लोगों ने बाहुबली से एक कविता सुनाने की फरमाइश कर दी।

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अहिंसा का सिद्धान्त

अहिंसा का सिद्धान्त

अहिंसा के प्रवर्तक-प्रचारक गाँधी जी ने अहिंसा के मार्ग पर चलकर अँग्रेज़ों को भारत से भगाकर ही दम लिया और यह सिद्ध कर दिया कि अहिंसा से बढ़कर और कोई दूसरी शक्ति नहीं। हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'लगे रहो मुन्नाभाई' में अहिंसा के सिद्धान्त को ही एक नूतन स्वरूप में आत्मसात किया गया था जिसके कारण फ़िल्म अत्यधिक सफल रही। क्या आपने कभी सोचा है- आखिर क्या है अहिंसा का सिद्धान्त? आखिर ऐसी कौन सी शक्ति है जो अहिंसा के पीछे काम करती है। वह कौन सा कारक है जो अहिंसा के सिद्धान्त को विजयपथ की ओर अग्रसित करता है?

कार में सत्संग

कार में सत्संग

सत्संग-महात्मय के बारे में महंत राम गोविंद दास महात्यागी महाराज का कहना है कि 'जीवन में सत्संग का मिलना बड़ा दुर्लभ है। सत्संग से जीवन की सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है।'

आस्था  पर प्रश्नचिह्न

आस्था पर प्रश्नचिह्न

ईश्वरीय सत्ता पर आस्तिक लोगों के अकाट्य विश्वास को परिलक्षित करती हुई हिन्दी में एक प्रचलित लोकोक्ति है- ‘जाको राखे साइयाँ, मार सके न कोई’, किन्तु पाकिस्तान के एक स्कूल में आतंकवादियों द्वारा सौ से अधिक बेगुनाह और मासूम बच्चों की निर्ममतापूर्ण हत्या और उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में बी.एड. की छात्रा से दुष्कर्म के बाद नृशंस हत्या का सनसनीखेज मामला सामने आने के बाद भारत गणराज्य के एक प्रमुख हिन्दी समाचार-पत्र दैनिक जागरण के संवाददाता द्वारा छात्रा के पिता के बारे में यह संकेत करना कि छात्रा के पिता दिल्ली के चर्चित निर्भया सामूहिक दुष्कर्म कांड के विरोध में 17 दिन चले आंदोलन में शामिल रहे थे- क्या ईश्वरीय सत्ता के प्रति आस्तिक लोगों के अखण्ड विश्वास को डगमगाने के लिए काफ़ी नहीं है?

क्रोध और तनाव नियन्त्रण का अचूक फण्डा

क्रोध और तनाव नियन्त्रण का अचूक फण्डा

क्रोध और तनाव नियंत्रण से सम्बन्धित चर्चा आजकल अन्तर्जाल ही नहीं, सर्वत्र सुनाई देती है। 'क्रोध और तनाव पर नियंत्रण कैसे करें?' सिखाने के लिए अन्तर्जाल में तो बेहिसाब दूकानें हैं और सभी दूकानें धुँआधार चलती हैं! (Update in progress)

कलियुगी चाणक्य नीति

कलियुगी चाणक्य नीति

कबीरदास और रहीम यदि आज जीवित होते आज के समय के. अनुकूल कैसे-कैसे दोहे लिखते यह हम पहले ही एक सूत्र में लिखकर पाठकों का मनोरंजन कर चुके हैं। अब देखिए, चाणक्य यदि आज ज़िन्दा होते तो उनकी नीतियाँ कैसी होतीं? कितनी मनोरंजक होतीं?